अभी के लिए बस इतना ही

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पिछले तीन सालों से मैं लगातार यहाँ, इस ब्लॉग पर, कुछ न कुछ लिखता आ रहा हूँ। चाहे मैं जितना भी आलसी हूँ पर हर पंद्रह-बीस दिनों बाद खुद को लगने लगता था कि साहब अब तो कुछ लिख देना चाहिए वरना जो थोड़े-बहुत लोग पढ़ते हैं मेरा ब्लॉग, उनको लगने लगेगा कि मैं भी पढ़ाई-लिखाई के चंगुलों में फंस गया हूँ और अब लिखना छोड़ दिया है।

अब तक तो आप नीचे देख चुके होंगे और अगर अब भी आप ये पढ़ रहे हैं तो बता दूँ कि आज इस ब्लॉग पोस्ट में कोई कविता नहीं है (और ये इसलिए नहीं कि कुछ नया लिखा नहीं मैंने)। मैं पिछले सात-आठ सालों से कविताएँ लिख रहा हूँ और जैसे-जैसे मैंने हिंदी-उर्दू की साहित्यिक किताबें पढ़नी शुरू की मुझे लगने लगा कि अभी बहुत कुछ है सीखने-समझने को। यूँ ही जो तिल जितना आता है मुझे, खुलेआम उसका ढिंढोरा पीटने में कोई होशियारी नहीं है।

क्योंकि मैं अपने कॉलेज में हिंदी साहित्य का विद्यार्थी नहीं हूँ, मुझे इस विषय को और बेहतर तरीके से समझने के लिए खुद ही मेहनत करनी होगी। कई किताबें और काव्य संग्रह पढ़ने हैं, समझने हैं और इसलिए ये शायद इस ब्लॉग पर आखरी पोस्ट होगी।

इस वक्त इन्टरनेट पर ढेरों लोग हैं जो ख़ूब अच्छा लिखते हैं। आप उनके ब्लॉग ज़रूर पढ़ें और हिंदी से जुड़े रहें। आप इस ब्लॉग के ‘Contact me’ में जाकर मुझसे जुड़े रह सकते हैं।

अभी के लिए बस इतना ही। मेरी कविताएँ पढ़ने के लिए शुक्रिया।

अर्चित अग्रवाल

कैद

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हर  रोज़ एक चार-बाई-तीन की मेज़ के सामने,
बैठ जाते हैं लोग और
बेचा करते हैं अपनी काबीलियत,
समय और सपने।
या कभी तो घर तक उठा लाते हैं बोझ
और चुपचाप सी रात में
नींदों का क़त्ल कर दिया जाता है।

ये पैसा बहुत ही दुष्ट है,
इसे आज से कैद में रखा जाए।

अर्चित अग्रवाल

घर

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एक घर हो जिसे आप अपना कह सकें, हर किसी की चाहत होती है। इस कविता में अपने घर होने की ख़ुशी को दिखाने की कोशिश की गई है। इस कविता के मुख्य किरदार ने अपनी हैसीयत के हिसाब से अपना घर बनाने में अपनी जान फूँक दी और हो सकता है कि लोग उस पर हंसें, उसका मज़ाक उड़ाएं , पर वो खुश है, संतुष्ट है। इस कविता में किसी पर कोई ऊँगली नहीं उठायी गई ,बस ख़ुशी बयान  की गई है

पत्थर पे पत्थर टिकाके,
बगल की दिवार के सहारे,
एक घर बनाया था उसने। 

हर ईंट में कुछ सपने छुपाये थे,
जो छत की चाहत के बाद आए थे।
चमक-धमक वाले रंग नहीं तो,
गेरुए से ही एक कोने में हुकुम बिठाए थे।
खूब हँसते होंगे लोग मगर,
बड़ी मन्नतों से
अपना संसार बनाया था उसने।
पत्थर पे पत्थर टिकाके,
बगल की दिवार के सहारे,
एक घर बनाया था उसने। 

अगली सड़क से एक बालिश्त अंदर,
गेंदे की एक क्यारी थी।
छत पे पिघलती धूप और
दीवारों पे थोड़ी कलाकारी थी।
बासठ बरस तक अग्राह्य रहकर,
आज खुद ही खुद को
स्वीकार किया था उसने।
पत्थर पे पत्थर टिकाके,
बगल की दिवार के सहारे,
एक घर बनाया था उसने। 

अर्चित अग्रवाल

प्रमाण

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तकरीबन दो महीनों से मैंने यहाँ कुछ भी पोस्ट नहीं किया है और वो इसलिए नहीं कि कुछ लिखा नहीं मैंने बल्कि इसलिए कि टाईप करने में जो आलस आता है, मैं उससे कभी जीत नहीं पाया हूँ।

खैर, कविता की बात करते हैं।  ये कविता बेहद सरल और सीधी भाषा में लिखी गई है। मतलब साफ़ है और उन अस्थायी क्षणों में लिखी गई है जब ऐसा लगता है कि सब कुछ आपके खिलाफ हो रहा है।

थक चुका हूँ अब मैं,
इस टेढ़ी-मेढ़ी राह पर,
हर दो कदम पर,
गिर-गिरकर। 
वो जो अब भी मानते हैं तुझको,
कहते हैं कि ठीक हो जाएगा सब
अंत तक। (न जाने किसके?)

मैं ख़ौफ़ के घेरे में हूँ ,
मेरे सीने पर जैसे दुनिया भर का भार है,
मैं कब से काँप रहा हूँ जबकि
बाकी संभल चुके हैं और प्रफुल्लित हैं अब
एक-दो ठोकर खाकर ही।

ऐ खुदा ! माफ़ करना जो तेरे गुरूर को ठेस पहुँचे 
पर मुझे अब तेरे होने का प्रमाण चाहिए।

अर्चित अग्रवाल 

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