ज़रा सोचो

Leave a comment

यह कविता थोड़ी गहरी है और रोज़मर्रा की चीज़ों से ज़रा हटके है। हो सकता है कि इस कविता के पीछे की मुख्य सोच पर आप मुझसे सहमत न हों क्योंकि सब की एक अलग परिभाषा है, सबके अलग विचार हैं इस विषय पर और अगर आपने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं तो अब ज़रा एक बार सोच लीजिये।

कब तक तुम खुद से यूँ ही मिलते रहोगे,
सवेरे घर से निकलते हुए आईने में,
लैपटॉप की स्क्रीन पर पड़ रही परछाई में,
या दूसरों के धूप के चश्मों में?
कब तक मंज़ूर है तुम्हें ये अधूरापन?

ज़रा सोचो कैसा हो अगर तुम
पत्ती बन उड़ जाओ किसी तेज़ झोंके के संग,
मिल जाओ रेत की तरह किसी समुद्री लहर में
या धुएँ की तरह गायब हो जाओ ऊपर उठते हुए
और इत्तेफाक़ से ये हवा, लहरें, धुआँ
फेंक दें तुम्हें ऐसे किसी एकांत में,
जहाँ तुम कभी गलती से
अपनी रूह छोड़ आए थे।

ऐसा इत्तेफाक़ होना मुमकिन है और
रूह का मिलना ही अंतिम सत्य है।।

अर्चित अग्रवाल

पन्द्रह अगस्त

Leave a comment

हर साल  15 अगस्त को देश भर में लोग ख़ूब बढ़-चढ़कर आज़ादी का जश्न मनाते हैं। स्कूलों में, सरकारी दफ्तरों में एकदम गर्व से तिरंगा फहराया जाता है। कुछ तो सचमुच खुश होते होंगे इन राष्ट्रीय त्यौहारों पर लेकिन हर कोई दिल से खुश है, ये मैं मानने को तैयार नहीं हूँ। खैर, वो बहस बिलकुल अलग है जिसमें देशवासियों पर यह इलज़ाम लगाया जाए कि वे देशभक्त नहीं हैं।
आजकल लोग  15 अगस्त पर जितने भी खुश हों, मेरा मानना है कि सच्ची ख़ुशी केवल उनको हुई होगी जिन्होंने इस आज़ादी को पाने के लिए अपना योगदान दिया और इस ख़ास दिन को देख पाए। ज़रा सोचो, जब हर दिशा ‘भारत माता कि जय ‘ और ‘वन्दे मातरम्’ के नारों से गूँज रही होगी, तब उन लोगों का मन कैसे धड़क रहा होगा और सीना गर्व से तना हुआ होगा। कोई रोक-टोक नहीं, उस दिन किसी तरह कि क्लिष्टता नहीं और सब खुशी से पागल हैं। मैं हमेशा से चाहता हूँ कि काश मैं यह सब खुद देख पाता पर क्योंकि ऐसा नहीं हुआ, मैंने इस कविता के ज़रिए इतिहास के उस अमूल्य दिन को जिया है। मुझे लिखने में मज़ा आया, आपको भी पढ़ने में वही मज़ा आएगा, ऐसी आशा है …

हर चौंक पर तिरंगा था,
क्या छटा थी घर, आँगन, आलिंद की,
हर ओर ज़बानें चीख रही थीं,
जय भारत, जय हिंद की।

महान वो वीर जो खूँ से अपने,
जल्लादों के हाथ रंग आए।
सुख के सब लिबास फेंके
औ’ जंग में नंग-धडंग आए।
वो हिम्मत-साहस के संग आए,
जैसे विषैले भुजंग आए।
आज वो कितने गदगद होते,
नाच-नाच बस पागल होते,
देख मुस्कानें अपने देश, शहर, पिंड की।
हर ओर ज़बानें चीख रही थीं,
जय भारत, जय हिंद की
जय भारत, जय हिंद की।।

क्रूर निर्दयी बेड़ियाँ पिघलीं,
दिन हैं अब सम्मान के।
खेत, जंगल, नदियाँ, टीले
सब कुछ हिन्दुस्तान के।
हर होंठ पर किस्से शान के,
सपने बस अभिमान के।
ये आज़ादी उस हर शख्स की,
जो दे सके इस भूमि को,
अपनी सोच, शक्ति और ज़िन्दगी।
हर ओर ज़बानें चीख रही थीं,
चीख रही थीं, चीख रही थीं,
जय भारत, जय हिंदी की
जय भारत, जय हिंदी की।।

अर्चित अग्रवाल

ज़बान

Leave a comment

स्कूलों में जब अध्यापक पचास मिनट चुप रहने को कहते थे तो ऐसा लगता था कि इससे गंदी कोई और सज़ा हो ही नहीं सकती। फिर यह चलन शुरू हुआ कि अगर अंग्रेज़ी के अलावा किसी और भाषा में बोला कुछ, तो डायरी में नोट चढ़ा दिया जाएगा जिसके डर से फिर हमने चुप रहना ही ठीक समझा क्योंकि कोई मज़ा नहीं था खेलते हुए, खाते हुए अंग्रेज़ी में बड़-बड़ करना। ऐसा लगता था कि कुछ कहीं अब भी रह गया मन के अन्दर जो बाहर नहीं आएगा जब तक अपनी भाषा में न बोल लें। अब इसी सज़ा को बड़े पैमाने पर देखते हैं। स्कूल में तो पता था कि २ बजे के बाद कोई रोक-टोक नहीं होगी पर सोचिये क्या बीतती होगी उस आदमी पे जो विलायत गया हो कुछ पैसे कमाने और उसे वहाँ कोई हमज़बान न मिले। ये तो जीवन भर की सज़ा हो गई न?

कोई न था एक ही मुल्क का,
न ही कोई हमज़बान जिसे बता सके खुलकर
कि आज पहला शब्द बोला था उसके बेटे ने फोन पर,
या तेज़ सर्दी के कारण माँ के पैरों पर चकत्ते हो गए हैं।
छोटे भाई की डिग्री पूरी हुई है
और बालकनी का छज्जा गिर जाने से बेफिज़ूल का ख़र्चा बढ़ गया है।

पिछले चार बरस से घुट-घुट कर 
इतना तंग हो चूका था शायद कि जब
कमर सीधी कर थोड़ा सुस्ताना चाहा
तो बेआवाज़, गुप्तता में,
वो मिट्टी ओढ़कर सो गया।

अब क्या पता खुदा भी उसकी ज़बान जानता होगा या नहीं।। 

 

अर्चित अग्रवाल

रात

1 Comment

रातों की तुलना अक्सर अँधेरे से की जाती है और जिस तरह अँधेरे से सब दूर रहना चाहते हैं, लोग रात को भी नज़रंदाज़ करते हैं। अगर कभी कोई रात को सकारात्मक तरीके से सोचे भी तो उसमें प्रेम के कण ज़्यादा दिखते हैं। मुझे लगता है कि इन सबमें हम छोटी-छोटी चीज़ों को अनदेखा कर रहे हैं। रात की ठंडी बयार, शीतल मिट्टी, चमकते जुगनू , मेंढक-मच्छरों की आवाजें कुदरत का ही हिस्सा हैं। ये कविता पाठक को अपने डब्बे से बंद कमरों से बाहर निकलकर इन मामूली चीज़ों का मज़ा लेने को कहती है और अगर किसी को लगता है कि रात को अकेले ही रहना चाहिए तो मेरी नज़र में तो आप एक अलग ही स्तर पर गलत हैं।

एक बात यूँ छुपाई गई है,
कल रात तारों की आढ़ में
सूरज चोरी हुआ है।

 

रात भर फड़फड़ाते पत्ते,
मस्ती में डोल रहे थे,
मेंढक कहीं टर्राकर छिप जाते तो,
सीटियों से बहलाकर उनको,
झोंके कुछ-कुछ बोल रहे थे।
जो तुम्हें नींद की गोद में छोड़ आए,
ऐसा हर गीत ही तो लोरी हुआ है।
कल रात तारों की आढ़ में
सूरज चोरी हुआ है।।

 

क्या करेगा दीया जलाकर,
वो अँधेरा तो न निगल पाएगा,
क्यों घुसा पड़ा है एक डिब्बे में,
न सपने कहीं जाएँगे,
न नम स्पर्श से तू गल जाएगा।
‘गर ओस की एक बूँद तुम्हारी थकन मिटा दे,
तो वो ही गंगा, यमुना, कावेरी हुआ है।
कल रात तारों की आढ़ में
सूरज चोरी हुआ है।।

 


अर्चित अग्रवाल

Older Entries

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 841 other followers

%d bloggers like this: