रात

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रातों की तुलना अक्सर अँधेरे से की जाती है और जिस तरह अँधेरे से सब दूर रहना चाहते हैं, लोग रात को भी नज़रंदाज़ करते हैं। अगर कभी कोई रात को सकारात्मक तरीके से सोचे भी तो उसमें प्रेम के कण ज़्यादा दिखते हैं। मुझे लगता है कि इन सबमें हम छोटी-छोटी चीज़ों को अनदेखा कर रहे हैं। रात की ठंडी बयार, शीतल मिट्टी, चमकते जुगनू , मेंढक-मच्छरों की आवाजें कुदरत का ही हिस्सा हैं। ये कविता पाठक को अपने डब्बे से बंद कमरों से बाहर निकलकर इन मामूली चीज़ों का मज़ा लेने को कहती है और अगर किसी को लगता है कि रात को अकेले ही रहना चाहिए तो मेरी नज़र में तो आप एक अलग ही स्तर पर गलत हैं।

एक बात यूँ छुपाई गई है,
कल रात तारों की आढ़ में
सूरज चोरी हुआ है।

 

रात भर फड़फड़ाते पत्ते,
मस्ती में डोल रहे थे,
मेंढक कहीं टर्राकर छिप जाते तो,
सीटियों से बहलाकर उनको,
झोंके कुछ-कुछ बोल रहे थे।
जो तुम्हें नींद की गोद में छोड़ आए,
ऐसा हर गीत ही तो लोरी हुआ है।
कल रात तारों की आढ़ में
सूरज चोरी हुआ है।।

 

क्या करेगा दीया जलाकर,
वो अँधेरा तो न निगल पाएगा,
क्यों घुसा पड़ा है एक डिब्बे में,
न सपने कहीं जाएँगे,
न नम स्पर्श से तू गल जाएगा।
‘गर ओस की एक बूँद तुम्हारी थकन मिटा दे,
तो वो ही गंगा, यमुना, कावेरी हुआ है।
कल रात तारों की आढ़ में
सूरज चोरी हुआ है।।

 


अर्चित अग्रवाल

सपने

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हर कोई ऊपर उठना चाहता है, सफल होना चाहता है पर मेरा मानना है कि हम सबके अंदर किसी एक चीज़ का डर है जो हमारी करनी और सोच के  बीच आता है। इस डर को दूर करने का छोटा सा प्रयास हमें अपने लक्ष्य के एक कदम और पास लेकर जा सकता है। उठिए, मेहनत कीजिए, सफलता आपका इंतज़ार कर रही है।

 

उस रात बड़ा ही सन्नाटा था
जब उछलकर चाँद छुआ और
कुछ सपनों के बदले हम
अपनी नींदों का सौदा कर आए। 

 

हर हार में जीत दिखी फिर,
सब डर अपना खोल दिया,
दबा पड़ा था मन में जो,
हवाओं से सब बोल दिया।
नियमों से बहुत ऊब चुके तो,
बेख़ौफ़ वज़ीर को प्यादा कर आए।
उस रात बड़ा ही सन्नाटा था जब
कुछ सपनों के बदले हम
अपनी नींदों का सौदा कर आए।

 

-अर्चित अग्रवाल

पेशावर

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पेशावर में हुए आतंकी हमले को भुला देना नामुमकिन है। आतंकी वीर समझते हैं खुद को पर धिक्कार है उन कायरों पर, मूर्खों पर जो इतना गिर गए कि सियासती समस्या सुलझाने का इससे बेहतर कोई उपाय न सोच सके। दिन दिहाड़े 132 बच्चों की हत्या कर दहशतगर्दों ने सैंकड़ों सगे-सम्बन्धियों के सपने चूर किए हैं। सोचो क्या बीती होगी उस माँ पर, उस पिता पर जिसकी पाँच साल की बेटी, खोला अल्ताफ़, दूसरे ही दिन स्कूल से वापस न आ सकी। यकीनन चोटी बाँधकर, इस्त्री किए हुए कपड़े पहनकर एकदम सज बनकर गई होगी वो पढ़ने… जाती भी क्यों न? आखिर पिता ने कहा था कि ख़ूब ऊपर बढ़ना है उसे।

हर कोई बस हैरान है,
जो अब मदरसे में शमशान है,
जाने कितने पत्थर दिल होंगे,
कितने बुझदिल, कायर होंगे
जो बलिश्त-भर की काया भूनकर,
ग़रूर से फूल गए हैं।
आज बच्चे स्कूल गए हैं।।

कर तैयार सितारे अपने,
सवेरे भेजे थे वो शान से,
ख़ूब पढ़ेगा लाडला,
छोटे से इस अरमान से।
शान्ति उस माँ के नयनों को जो
इंतज़ार में दर-चौर पर झूल गए हैं।
आज बच्चे स्कूल गए हैं।।

मेला लगा है शहर में,
और आँगन में झूला बाँधा है,
मोटर-गाड़ी पास है फिर भी
सवारी में पिता का कांधा है।
शान्ति उस हर आह-आँसू को जो
मानते हैं कि, वे बस रस्ता भूल गए हैं।
आज बच्चे स्कूल गए हैं।।

-अर्चित अग्रवाल 

खूबसूरत

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पिछली कविता पर लोगों ने खुलकर अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाए। ढेरों ई-मेल आए और दोस्तों-मित्रों ने फोन पर भी मेसेज भेज-भेजकर तंग कर दिया। लोगों को कविता में या मेरे ब्लॉग में कोई रूचि नहीं है, उन्हें बस ये जानना है कि कविता किसके लिए लिखी थी… क्या करें लोगों को अपनी मूरखता दिखाने में ज़रा भी हिचकिचाहट नहीं होती। खैर वो सब छोड़िये, लोगों को बुराई करना भी कोई महानता नहीं है पर फिर भी अगर कभी मन हुआ या कुछ और लिखने को नहीं हुआ पास तो शुरु कर देंगे अपना पुराण। हमें कौन है रोकने वाला?

पिछली कविता लिखे 40-45 दिन हो गए हैं और ये दुःख की बात है कि कॉलेज बंद पड़ा है और फिर भी इस नालायक दिमाग में कुछ विचर नहीं रहा। ये सब लिखते हुए भी मेरे मन में कोई ख़याल नहीं आ रहे पर फिर भी मन कर रहा है कि प्रेम पर ही कुछ लिख डालूँ। तुक बँधाने में बहुत मेहनत लगती है और जब तक मैं शब्दों को ऊपर-नीचे करूँगा, मेरे हाथ रज़ाई के बाहर पड़े-पड़े सुन हो जाएँगे… सीधे-साधे शब्दों में ही कुछ लिखने की कोशिश करता हूँ और हाँ, प्रेम कवितायें बस इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि पिछला एहसास अच्छा था। देखते हैं आज क्या लिखा जाता है। कविता कैसी भी हो, इस बार फिर ई-मेल ज़रूर किजीयेगा…

घने कोहरे में छिपकर वो फिर,
उसे फूल चुगते देख रहा है,
रात पर पहरा लगाने आ चुका है चाँद
और शाम के बादलों पर डामर पोत रहा है कोई।
बच्चे अपनी घुटने और ठोडियाँ पोंछकर
चल पड़े हैं घर की ओर,
अपनी उधड़ी कमीजें छिपाते हुए
उसी तरह , जिस तरह छिपा रहा है वो
खुद से अपने मन को।

ठण्ड से उसके पैरों पर चकत्ते-से हैं,
फड़क रहा है दाहिना हाथ,
पर वो भूल गया है अपनी सब व्यथा
और रोक रहा है खुद को।
वो भी फूल तोड़ना चाहता है,
उनपर पसरकर सीधी करना चाहता है
माथे पर पड़ी सलवटें,
जो शायद पिछली बारिशों में पड़ी थीं 
या पतंगबाजी के दौरान, याद नहीं।

नाक-भौंह मत चढ़ाना,
तुम्हें भी पसंद तो होगी तारीफ अपनी…
ए प्रिये! तुम में सब रंग हैं इन फूलों के
और तुम बेहद खूबसूरत हो।।

-अर्चित अग्रवाल

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