घर

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एक घर हो जिसे आप अपना कह सकें, हर किसी की चाहत होती है। इस कविता में अपने घर होने की ख़ुशी को दिखाने की कोशिश की गई है। इस कविता के मुख्य किरदार ने अपनी हैसीयत के हिसाब से अपना घर बनाने में अपनी जान फूँक दी और हो सकता है कि लोग उस पर हंसें, उसका मज़ाक उड़ाएं , पर वो खुश है, संतुष्ट है। इस कविता में किसी पर कोई ऊँगली नहीं उठायी गई ,बस ख़ुशी बयान  की गई है

पत्थर पे पत्थर टिकाके,
बगल की दिवार के सहारे,
एक घर बनाया था उसने। 

हर ईंट में कुछ सपने छुपाये थे,
जो छत की चाहत के बाद आए थे।
चमक-धमक वाले रंग नहीं तो,
गेरुए से ही एक कोने में हुकुम बिठाए थे।
खूब हँसते होंगे लोग मगर,
बड़ी मन्नतों से
अपना संसार बनाया था उसने।
पत्थर पे पत्थर टिकाके,
बगल की दिवार के सहारे,
एक घर बनाया था उसने। 

अगली सड़क से एक बालिश्त अंदर,
गेंदे की एक क्यारी थी।
छत पे पिघलती धूप और
दीवारों पे थोड़ी कलाकारी थी।
बासठ बरस तक अग्राह्य रहकर,
आज खुद ही खुद को
स्वीकार किया था उसने।
पत्थर पे पत्थर टिकाके,
बगल की दिवार के सहारे,
एक घर बनाया था उसने। 

अर्चित अग्रवाल

प्रमाण

2 Comments

तकरीबन दो महीनों से मैंने यहाँ कुछ भी पोस्ट नहीं किया है और वो इसलिए नहीं कि कुछ लिखा नहीं मैंने बल्कि इसलिए कि टाईप करने में जो आलस आता है, मैं उससे कभी जीत नहीं पाया हूँ।

खैर, कविता की बात करते हैं।  ये कविता बेहद सरल और सीधी भाषा में लिखी गई है। मतलब साफ़ है और उन अस्थायी क्षणों में लिखी गई है जब ऐसा लगता है कि सब कुछ आपके खिलाफ हो रहा है।

थक चुका हूँ अब मैं,
इस टेढ़ी-मेढ़ी राह पर,
हर दो कदम पर,
गिर-गिरकर। 
वो जो अब भी मानते हैं तुझको,
कहते हैं कि ठीक हो जाएगा सब
अंत तक। (न जाने किसके?)

मैं ख़ौफ़ के घेरे में हूँ ,
मेरे सीने पर जैसे दुनिया भर का भार है,
मैं कब से काँप रहा हूँ जबकि
बाकी संभल चुके हैं और प्रफुल्लित हैं अब
एक-दो ठोकर खाकर ही।

ऐ खुदा ! माफ़ करना जो तेरे गुरूर को ठेस पहुँचे 
पर मुझे अब तेरे होने का प्रमाण चाहिए।

अर्चित अग्रवाल 

ज़रा सोचो

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यह कविता थोड़ी गहरी है और रोज़मर्रा की चीज़ों से ज़रा हटके है। हो सकता है कि इस कविता के पीछे की मुख्य सोच पर आप मुझसे सहमत न हों क्योंकि सब की एक अलग परिभाषा है, सबके अलग विचार हैं इस विषय पर और अगर आपने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं तो अब ज़रा एक बार सोच लीजिये।

कब तक तुम खुद से यूँ ही मिलते रहोगे,
सवेरे घर से निकलते हुए आईने में,
लैपटॉप की स्क्रीन पर पड़ रही परछाई में,
या दूसरों के धूप के चश्मों में?
कब तक मंज़ूर है तुम्हें ये अधूरापन?

ज़रा सोचो कैसा हो अगर तुम
पत्ती बन उड़ जाओ किसी तेज़ झोंके के संग,
मिल जाओ रेत की तरह किसी समुद्री लहर में
या धुएँ की तरह गायब हो जाओ ऊपर उठते हुए
और इत्तेफाक़ से ये हवा, लहरें, धुआँ
फेंक दें तुम्हें ऐसे किसी एकांत में,
जहाँ तुम कभी गलती से
अपनी रूह छोड़ आए थे।

ऐसा इत्तेफाक़ होना मुमकिन है और
रूह का मिलना ही अंतिम सत्य है।।

अर्चित अग्रवाल

पन्द्रह अगस्त

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हर साल  15 अगस्त को देश भर में लोग ख़ूब बढ़-चढ़कर आज़ादी का जश्न मनाते हैं। स्कूलों में, सरकारी दफ्तरों में एकदम गर्व से तिरंगा फहराया जाता है। कुछ तो सचमुच खुश होते होंगे इन राष्ट्रीय त्यौहारों पर लेकिन हर कोई दिल से खुश है, ये मैं मानने को तैयार नहीं हूँ। खैर, वो बहस बिलकुल अलग है जिसमें देशवासियों पर यह इलज़ाम लगाया जाए कि वे देशभक्त नहीं हैं।
आजकल लोग  15 अगस्त पर जितने भी खुश हों, मेरा मानना है कि सच्ची ख़ुशी केवल उनको हुई होगी जिन्होंने इस आज़ादी को पाने के लिए अपना योगदान दिया और इस ख़ास दिन को देख पाए। ज़रा सोचो, जब हर दिशा ‘भारत माता कि जय ‘ और ‘वन्दे मातरम्’ के नारों से गूँज रही होगी, तब उन लोगों का मन कैसे धड़क रहा होगा और सीना गर्व से तना हुआ होगा। कोई रोक-टोक नहीं, उस दिन किसी तरह कि क्लिष्टता नहीं और सब खुशी से पागल हैं। मैं हमेशा से चाहता हूँ कि काश मैं यह सब खुद देख पाता पर क्योंकि ऐसा नहीं हुआ, मैंने इस कविता के ज़रिए इतिहास के उस अमूल्य दिन को जिया है। मुझे लिखने में मज़ा आया, आपको भी पढ़ने में वही मज़ा आएगा, ऐसी आशा है …

हर चौंक पर तिरंगा था,
क्या छटा थी घर, आँगन, आलिंद की,
हर ओर ज़बानें चीख रही थीं,
जय भारत, जय हिंद की।

महान वो वीर जो खूँ से अपने,
जल्लादों के हाथ रंग आए।
सुख के सब लिबास फेंके
औ’ जंग में नंग-धडंग आए।
वो हिम्मत-साहस के संग आए,
जैसे विषैले भुजंग आए।
आज वो कितने गदगद होते,
नाच-नाच बस पागल होते,
देख मुस्कानें अपने देश, शहर, पिंड की।
हर ओर ज़बानें चीख रही थीं,
जय भारत, जय हिंद की
जय भारत, जय हिंद की।।

क्रूर निर्दयी बेड़ियाँ पिघलीं,
दिन हैं अब सम्मान के।
खेत, जंगल, नदियाँ, टीले
सब कुछ हिन्दुस्तान के।
हर होंठ पर किस्से शान के,
सपने बस अभिमान के।
ये आज़ादी उस हर शख्स की,
जो दे सके इस भूमि को,
अपनी सोच, शक्ति और ज़िन्दगी।
हर ओर ज़बानें चीख रही थीं,
चीख रही थीं, चीख रही थीं,
जय भारत, जय हिंदी की
जय भारत, जय हिंदी की।।

अर्चित अग्रवाल

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